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चन्‍द्रशेखर वेंकटरमण
आधुनिक भारतीय विज्ञान का एक आख्‍यान
 
 
   
C V Raman

डॉ. सुबोध महन्‍ती

सब एतिहासिक अनुभव इस सच्‍चाई को पुष्टि करते हैं कि आदमी ने संभव को प्राप्‍त न किया होता जबतक कि असंभव तक पहुचने के लिए उसने बार-बार कोशिश न की होती।

मैक्‍स वेबर (1864-1920)

जब नोबल पुरस्‍कार की घोषण की गई थी तो मैं ने इसे अपनी व्‍यक्तिगत विजय माना, मेरे लिए और मेरे सहयोगियों के लिए एक उपलब्धि-एक अत्‍यंत असाधरण खोज को मान्‍यता दी गई है, उस लक्ष्‍य तक पहुंचने के लिए जिसके लिए मैंने सात वर्षों से काम किया है। लेकिन जब मैंने देखा कि उस खचाखच हाल मैंने इर्द-गिर्द पश्चिमी चहरों का समुद्र देखा और मैं, केवल एक ही भारतीय, अपनी पगड़ी और बन्‍द गले के कोट में था, तो मुझे लगा कि मैं वास्‍तव में अपने लोगों और अपने देश का प्रतिनिधित्‍व कर रहा हूं। जब किंग गुस्‍टाव ने मुझे पुरस्‍कार दिया

तो मैंने अपने आपको वास्‍तव में विनम्र महसूस किया, यह भावप्रवण पल था लेकिन मैं अपने ऊपर नियंत्रण रखने में सफल रहा। जब मैं घूम गया और मैंने ऊपर ब्रिटिश यूनियन जैक देखा जिसके नीचे मैं बैठा रहा था और तब मैंने महसूस किया कि मेरे गरीब देश, भारत, का अपना ध्वज भी नहीं है- और मेरा इसी से मेरा पूर्णत: अभिभूत हो गा।

सी.वी. रमण

मैंने किसी ऐसे आदमी को कभी नहीं देखा जो विज्ञान से इतना आनन्द लेता था। चीज़ों को देखने का विशुद्ध आनन्द और विज्ञान का कार्य करना उसे उल्लास और उत्तेजना से परिपूर्ण कर देता था। जीवन के लिए वह अविश्वसनीय जोश रखता था। वह अपने खाने, अपने चुटकुलों, अपनी लड़ाइयों और झगड़ों से मज़ा लेता था। लेकिन विज्ञान के लिए उसे जो आनन्द मिलता था वह कुछ अलग ही चीज़ थी। ऐसा लगता था कि देदीप्यमान प्रकृति की मौजूदगी में इसके अनुसरण में उसका अहं पूरी तरह गायब हो जाता था। हां, वह आश्चर्य और सुन्दरता में वस्तुत: खो जाता था जिसे वह समझने की कोशिश कर रहा था।

सी वी रमण पर एस रामासेशन (सी वी रमण: चित्रमत्र जीवन चरित्र, भारतीय विज्ञान अकादमी बेंगलोर)

 

बहुत से लोग चन्द्र शेखर बेंकटरमण (सी वी रमण के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध) को जानते हैं क्योंकि वह पहला भारतीय था जिसे विज्ञान में नोवेल पुरस्कार मिला। अब तक रमण ही एक मात्र भारतीय है जिसने विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। भारतीय मूल के दो वैज्ञानिक है यानी गोबिन्द खुराना और सुब्रामण्यिन चन्द्रशेखर (जो यूएस नागरिक बनाए) जिन्हें विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला।

रमण पहला एशियन भी था जिसे विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला। रमण के प्रसिद्ध खोज, रमण प्रभाव, में प्रयोग करते हुए प्रदर्शित किया गया कि प्रकाश कूवाण्टा और अणु में ऊर्जा का आदान-प्रदान निश्चित रूप से करते है जो बिखरे प्रकाश के रंग के परिवर्तन के रूप में अपने आपको प्रकट करती है। तथापि, इस तथ्य की पहले हेन्ड्रिक एन्थोनी क्रामर्स (1894-1952) और बर्नर हीज़नबर्ग (1901-76) ने सिद्धांत रूप से भविष्यवाणी की थी। प्रकाश के क्वाण्टम सिद्धांत का यह अत्यधिक युक्तियुक्त सबूत था। इससे रमण की खोज का महत्व कम नहीं होता। जैसा कि एल्बर्ट इंन्स्टीन (1879-1955) लिखते है, ‘सी वी रमण पहला वैज्ञानिक था जिसने माना और प्रदर्शन किया कि फ़ोटोन की ऊर्जा द्रव्य के भीतर अंशिक रूपांतरण कर सकती है। मुझे अब भी याद है कि इस खोज का हम सब पर गहरा प्रभाव हुआ।’

विज्ञान में रमण की दिलचस्पी खगोल-विज्ञान और मौसमी-विज्ञान से शरीर-विज्ञान तक। रमण ने 475 शोध-पत्र प्रकाशित किए और ऐसे विषयों पर असाधारण प्रबन्ध लिखे जो इतने विभिन्न थे कि मन चकरा जाता है।

रमण ने ध्वनिक, अल्ट्रासोनिक, प्रकाशीय, चुम्बकत्व और क्रिस्टल भौतिक में अनेक बड़ी वैज्ञानिक खोजें की। भारत में संगीत ड्रमों पर रमण के कार्य युगान्तरकारी थे और इसमें प्राचीन हिन्दुओं के ध्वनिक ज्ञान को प्रकट किया गया। यह बताना जरूरी है कि पाइथागोरस ने पहले पहले मानव श्रवण के लिए ध्वनि संगीत का निर्माण किया।

लंडन की रायल सासाइटी का ह्यूज पदक प्रदान करने के आवसर पर लार्ड रूथरफ़ार्ड (1871-1937) ने रमण की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर निम्नानुसार टिप्पणी की:

‘सर वेंकटारमण प्रकाशीय पर अग्रणी प्राधिकारियों में से एक है, विशेषत: प्रकाश के प्रकीर्णन के तथ्य पर।

इस संबंध में लगभग तीन वर्ष पहले उन्होंने खोज कि प्रकीर्णन से प्रकाश का रंग बदला जा सकता है। कुछ समय इसकी भविष्यवाणी की की गई थी लेकिन अनुसन्धान करने के बावजूद परिवर्तन का पता नहीं चला था। गत दशक में प्रयोगात्मक भौतिक में तीन या चार सर्वोत्तम खोज के बीच ‘रमण प्रभाव’ को रखा जा सकता है, इसने साबित किया है कि साबित करेगी कि ठोस के सिद्धांत के अध्ययन में यह महान शक्ति का साधन होगा। ज्ञान के बहुत से क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा, उसने (रमण) कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञानों में अनुसन्धान एक सक्रिय स्कूल विकसित किया है।’

रमण ने भौतिक विज्ञान का एक जीवन्त और शानदार स्कूल विकसित किया। उसने भारतीय विज्ञान अकादमी, बेंगलोर (1934) और रमण अनुसन्धान संस्थान (1948) स्थापित किए।

रमण याद किए जाने का अधिकारी है केवल अपनी उच्चतम वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के लिए भी। रमण पक्का देश-भक्त था और प्रगति के लिए भारत की शक्ति में उसे पूरा भरोसा था। अत्यन्त विपरित परिस्थितियों में भी वह उत्कृष्ट बना। रमण ने विज्ञान को बहुत लोक प्रिय बनाया। वह शायद सब से बड़ा सेल्समैन था जो विज्ञान ने इस देश में पाया, एस. रामासेशन कहते है जो भारत में एक्स-रे क्रिस्टोलोग्राफ़ी के अग्रगामी और रमण के भतीजे थे। अपने लोक-प्रिय विज्ञान भाषणों (या निष्पादनों जैसे रमण उन्हें कहता था) के दौरान रमण श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर देता था। उसके भाषणों के साथ सदा सजीव प्रदर्शन होते थे। रमण विनोद-प्रिय था। रामासेशन के अनुसर, रमण के लोक-प्रिय विज्ञान भाषण इतने दिलचस्प होते थे क्योंकि वह केवल उन चीज़ों के बारे में ही बात करता था जिसके बारे में वह तीव्रता से महसूस करता था या उन चीज़ों के बारे में जिन्हें वह अच्छी तरह समझता था या बेहतर समझना चाहता था। वह चीज़ों को उनके सरलतम रूप और अत्यन्त मूल तत्वों में सामने लाता था। वह श्रोताओं का महसूस करने देता था कि उन्होंने भी यह सब कुछ देखा हुआ है। रमण एक अद्वितीय वक्ता था। उसके आलेचक भी इस बात के लिए तो सहमत ही थे। जीवन पर्यनत वह भाषण देता रहा। विभिन्न श्रोताओं के सामने वह भाषण देता था। तथापि वह अपनी सर्वोत्तम स्थिति में होता जब लोक-प्रिय विज्ञान भाषण देता। रमण रेडियो वार्ताएं भी करता था। उसकी उन्नीस रेडियो वार्ताओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का शीर्षक था ‘नवीन भौतिक: विज्ञानों के पहलुओं पर वार्ता।’ इसे न्यूयार्क की फ़िलासोफीकल लाइब्रेरी द्वारा प्रकाशित किया गया। रमण द्वारा लिए गए विषयों में परमाणुओं की सूक्ष्म दुनिया से लेकर ब्रह्मांड तक शामिल थे। रमण के लैक्चरों की गुणता का अंदाजा फ्रांसिस लो द्वारा लिखे इस पुस्तक के परिचय से लगाया जा सकता है, वह एक प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक-विज्ञानी था जो एडवांस्ड स्टडीज़ इंस्टीच्यूट, प्रिंसटन में तब काम करता था: भौतिक विज्ञान अपनी प्रकृति के कारण अपेक्षा करता है कि इसके विद्यार्थी अत्यधिक विशिष्टता प्राप्त करें। इसके निष्कर्ष, जिसमें वास्तविक मापों के परिणामों के लिए संख्याओं की अनतत: भविष्यवाणी की जाती है, सर्वोत्तम रूप में गणितीय सूत्रों में व्यक्त किए जाते है। इस का आलम यह है कि विषय को आम आदमी के लिए बहुत हद तक अबोधगम्य बना दिय जाता है। दुर्भाग्य से बहुत कम अध्यापक ऐसे है जो अवरोध को पार कर सकते है। प्रो. रमण ने एक पुस्तक लिखी है जिसमें इन फन्दों से बचा गया है और इस से आम पाठक को इस रूचिकर और महत्वपूर्ण विज्ञान के रहस्यों के कम से कम कुछ भागों में प्रवेश का अवसर दिया गया है।

रमण नीजी रूप से निपुणता में विश्वास रखता था। वह गुणवत्ता पर कभी समझौता नहीं करता था और उसका पक्का विश्वास था कि यदि भारत को कोई आर्थिक प्रगति करती है तो यह केवल ऐसी निपुणता पर ही आधारित हो सकती है। कला और संगीत में उसकी गहरी दिलचस्पी थी। वह किसी विशेष संकीर्ण विशेषज्ञता तक सीमित नहीं था। उसे विश्वास था कि वास्वविक मूलभूत उन्नति केवल उन्हीं के कारण होती है जिन्होंने विज्ञान की सीमाओं की उपेक्षा की है और विज्ञान को समग्र रूप में लेते हैं।’

raman's father
आर चन्द्रशेखर आईयर (मण के पिता)
raman's  mother
पार्वती अम्मल (रमण के माता)

रमण एक बहुत सरल व्यक्ति था। वह अत्यन्त अहंकारी भी था। लेकिन फिर भी निजी वार्तालाप में बहुधा वह बहुत विनम्रता दिखाता था। वह भावुक आदमी था। उसने अपनी भावनाओं को दबाने की कभी चिन्ता नहीं की। वह उग्र क्रोधी था। उसने बहुत लोगों को चोट पहुंचाई। वह किसी भी शक्ति से नहीं डरता था। कई बार वह एक बच्चे की तरह सबके सामने रोने लगता था। रमण में ‘सब बहुत मानव’ कमियां बहुतात में थीं, लेकिन तब वह एक शानदार भौतिक-विज्ञानी था और विज्ञान के अनुसरण में पूर्णत: समर्पित था।

सी.वी. रमण का जन्म 7 नवम्बर 1888 को अपने नाना के घर में हुआ जो तमिलनाडु में कावेरी के किनारे पर तिरूचिरापल्ली (उन दिनों त्रिचनापली) के पास थीरूवानायकवल के छोटे ग्राम में था। रमण क नाना सप्त ऋषि शास्त्री एक महान् संस्कृत विद्वान था जो अपनी जवानी के दिनों में नव न्याय (आधुनिक तर्क) सीखने के लिए दूर दराजा बंगाल (2000 किमी दूर) तक पैदल ही गया।

रमण के माता-पिता थे- आर. चन्द्रशेखर आईयर और पार्वती अम्मल। रमण के पिता आरंभत: बहुत वर्षों तक एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाते रहे लेकिन बाद में श्रीमती ए.वी. नरसिम्हा राव कॉलेज विशाखापटनम (तब विज़ागापटनम) आन्ध्रपदेश में गणित और भौतिक के लैक्चरर बने। रमण ने अपनी मैट्रिकूलेशन परीक्षा 11 वर्ष की आयु में उत्तीर्ण की और 13 वर्ष की आयु में वज़ीफे के साथ आनी एफ.ए. परीक्षा (आजकल के इन्टरमीडिएट के बराबर) पास की। 1903 में रमण ने प्रेसिडेंसी कॉलेज, चिन्नई (तब मद्रास) में दाख़िला लिया और वहां से बी.ए. (1904) और एम.ए. (1907) परीक्षाएं पास की। बी.ए. और एम.ए. की परीक्षाओं में प्रथम स्थान पर रहा और सब उपलब्ध पुरस्कार प्रापत किए। इस का कुछ अंदाज़ा लगाने के लिए यहां हम रमण को ही उद्धृत करते है।


रमण और एस.चन्द्रशेखर, ललिता चन्द्रशेखर का थोड़ा उल्लेख ह।

रमण ने लिखा:

‘अठारह वर्ष की आयु में मैंने अपना स्कूल और कालेज कैरियर और यूनिवर्सिटी परीक्षा समाप्त की। इस छोटी अवधि में, चार भाषाओं और विभिन्न प्रकार के अनेक विषयों का अध्ययन शामिल है जो कई मामलों में उच्चतम विश्वविद्यालय स्तर तक के थे। मैंने जितनी पुस्तकें पढ़नी पढ़ी उनकी सूची की लंबाई आश्चर्यजनक हैं क्या इन पुस्तकों ने मुझे प्रभावित किया हां? एक सीमित हद तक मुझे कई विषयों के बारे में उपयुक्त जानकारी मिली जिनमें प्राचीन यूनान और रोमन इतिहास, आधुनिक भारत और यूरोपीय इतिहास, औपचारिक तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र, धन सिद्धांत, लोक वित्त, दिवंगत संस्कृत लेखक, छोटे अंग्रेजी लेखक, शरीर-विज्ञान, रसायन और विशुद्ध और अनुप्रयुक्त गणित की और प्रायोगिक और सैद्धांतिक भौतिक-विज्ञान विषय शामिल थे। लेकिन विषयों और पुस्तकों की इन तरंगित लहरों में क्या मैं वास्तव में कोई चीज़ चुन सकता था जो मेरे बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का निर्माण करे और जीवन में मेरा पथ निर्धारित करे? हां मैं कर ऐसा सकता हूँ और इसके लिए मै। तीन पुस्तकों का उल्लेखर करना चाहूँगा।

एक उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए एक धुरी या क़ब्जे की जरूरत होती है जिसके साथ यह मज़बूती से जुड़ा हो लेकिन फिर भी उसके इर्दगिर्द आज़ादी से घूम सके। जैसा कि मैं देखता हूँ मेरे अपने मामले में यह धुरी या क़ब्जा काफ़ी मजबूत रहा है, वह विज्ञान का या प्रकृति के प्रति प्रेम नहीं था बल्कि मानव आत्मा के मूल्य और मानव प्रयास और उपलब्धि के गुण में एक निश्चित अमूर्त आदर्श या विश्वास था। इस आदर्शवाद स्रोत के समीपस्थ विन्दु को मैं जहां तक याद कर सकता हूँ वह एडविन आर्नल्ड की महान् पुस्तक दि लाइट ऑफ एशिया को पढ़ना था। मुझे याद है कि सिद्धार्थ के महान् त्याग और सच्चाई के लिए उसकी खोज और उसके अंतिम ज्ञानोदय की कहानी से मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ। पुस्तकों के अगले सैट का मैंने उल्लेख करना है, वह सब समय की अत्यनत आसाधारण रचनाएं हैं और उनका नाम है दि एलीमेन्ट्स ऑफ़ यूक्लिड। यूक्लिड के कुछ भागों का अति-परिचय और इसके रूढ़िवाद के लिए कुछ नापसन्दी के कारण इस महान कृति को उसकी स्पष्ट अविजय स्थिति से उपदस्थ कर दिया गया है जो अविविश्वसनीय रूप से लम्बे समय तक पांडित्य-पूर्ण विश्व में श्रद्धा का स्थान बनाए हुए थी। वास्तव में, यूक्लिड के अनिवार्य अध्ययन के प्रति मेरी अपनी आरंभिक अनुक्रियाएं अनुकूल नहीं थी। तथापि बहुत समय बाद सब नैसर्गिक ज्ञान के संबंध में ज्यामिति की केन्द्रीय स्थिति को मैंने पूरी तरह समझा। इस संबंध को हज़ारों उदाहरण देकर मैं चित्रित कर सकता हूँ लेकिन मै। इतना कहना ही पर्याप्त समझूंगा कि प्रकृति में पाया गया प्रत्येक खनिज, आदमी द्वारा बनाया गया प्रत्येक क्रिस्टल, प्रत्येक पत्ता, फूल या फल जिसे हम विकसित होते देखते है, छोटे से लेकर बड़ा प्रत्येक जीव जो धरती पर चलता है, वायु में उड़ता है, पानी में तैरता है या समुद्र तल की बहुत गहराई में रहता है, बड़ी ऊंची आवाज़ मे प्रकृति में ज्यामिति की मूलभूत भूमिका के बारे में बताता है। यूक्लिड के पृष्ठ ऐसे हैं जैसे प्रकृति के महान् नाटक के ग्रैंड अपेरा के संगीत की बारों में खोला जाए। इस प्रकार वे पर्दा उठाते हैं और अध्ययन के लिए प्रतीक्षा में प्राकृतिक ज्ञान के विशाल जगत् की एक झलक हमारी दृष्टि के सामने पेश करते हैं।

सदूर अतीत से विद्या के जगत् में जितने बड़े नाम आये हैं उनमें आर्शीमीडस, आम सहमति से, सब से उच्च स्थान रखता है। आधुनिक विश्व की बात करने पर, मेरे विचार में सब से बड़ी आकृति हर्मान वॉन हेल्महोल्टस की है। अपने ज्ञान की गहराई और विस्तार में अपनी वैज्ञानिक दृष्टि की सुस्पष्टता और गूढ़ता में वह सब दूसरे लोगों से, जिनका मैं उल्लेख कर सकता हूँ और इसमें इसॉक न्यूटन भी शामिल है, वह आसानी से सब से आगे है। उसे उचित रूप से उन्नीसवीं शताब्दी का बौद्धिक महापुरूष कहा गया। यह मेरा सुभाग्य था कि जब कालेज में मैं एक विद्यार्थी ही था तो उसकी महान् पुस्तक ‘दि सेन्सेशन ऑफ टोन’ के अंग्रेजी रूपांतर की एक प्रति तब मेरे पास उपलब्ध थी। जैसा कि सब जानते है यह हेल्महोल्टज की श्रेष्ठ कृतियों में से एक थी। इसमें संगीत और वाद्य यन्त्रों के विषयों को गम्भीर ज्ञान और सूक्ष्म दृष्टि के साथ ही नहीं बल्कि भाषा और अभिव्यक्ति की परम सुस्पष्टता के साथ भी लिया गया है। जब रमण एक विद्यार्थी था तो उसने ध्वनिक और प्रकाशीय में मूल खोजों को स्वतन्त्र रूप से हाथ में लिया। रमण मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज का पहला विद्यार्थी था जिसने शोध-पत्र प्रकाशित कराया था और वह भी सुप्रसिद्ध अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका में। उसका पहला शोध-पत्र ‘एक आयताकार छिद्र के कारण असममित विवर्तन बैंड’ नवम्बर 1906 को फिलासोफ़ीकल मैग्ज़ीन (लंडन) में प्रकाशित हुआ था। रमण द्वारा कालेज में एक साधारण स्पेक्टोमीटर का प्रयोग करते हुए प्रिज्म के कोणों को मापने का यह परिणाम था। इसके बाद उसी पत्रिका में सतह तनाव मापने के एक नए प्रयोगात्मक तरीके पर एक नोट प्रकाशित हुआ। लार्ड रेलेह (1842-1919) का ध्यान रमण द्वारा विद्यार्थी के रूप में प्रकाशित शोध-पत्रों की ओर गया। रेलेह एक उच्च गणितीय भौतिक विज्ञानी और एक अच्छा प्रयोगकर्ता था जिसे आर्गन की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। रमण और रेलेह का एक दूसरे से कुछ पत्राचार हुआ। यह ध्यान देने की दिलचस्प बात थी कि लार्ड रेलेह ने रमण को प्रोफ़ेसर कह कर सम्बोधित किया था।


रमण जे डी बर्नाल को हीरे दिखाते हुए

रमण और आर. ए. मिलीकान

यद्यपि वैज्ञानिक खोजों में रमण ने अपनी प्रति या का सबूत दे दिया लेकिन उन दिनों के मानकों के अनुसार विज्ञान को कैरियर के रूप में लेने के लिए उसे प्रोत्साहित नहीं किया गया अपने पिता के कहने पर रमण ने वित्तीय सिविल सेवा (FCS) की परीक्षा दी। परीक्षा में वह प्रथम स्थान पर रहा और 1907 के मध्य में रमण भारतीय वित्त विभाग में सहायक अकाउंटेंट जनरल के रूप में भरती के लिए कोलकाता (तब कलकत्ता) गया। वह तब 18 वर्ष का था। उसका आरंभिक वेतन 400रु. प्रति माह तक जो उन दिन एक बड़ी रकम थी। उस समय किसी के स्वपन्न में भी नहीं आया होगा कि रमण पुनः विज्ञान का अनुसरण करने का साहस करेगा। सरकारी सेवा में रमण का भविष्य अत्यन्त उज्जवल था और उन दिनों अनुसंधान के लिए अवसर विरले ही थे। तब एक दिन कार्यालय जाते समय रमण ने एक साइन बोर्ड देखा जिसपर लिखा था “विज्ञान के संवर्धन के लिए भारतीय संघ”। इसका पता था -210, बोबाज़ार स्ट्रीट। वापसी समय मे वह संघ में आया जहां वह पहले आशुतोष डे (आशु बाबू) नामक व्यक्ति से मिला जिसे 25 वर्षों के लिए रमण का असिस्टेंट रहना था। आशु बाबू रमण को संघ के अवैतनिक सचिव, अमृत लाल सरकार, के पास ले गया और रमण के इस आशय के बारे में जानकर वह बहुत खुश हुआ कि रमण संघ की प्रयोगशाला में अनुसंधान कार्य करना चाहता है। अमृत लाल के खुशी में समा न पाने का कारण यह था कि उसके पिता महेन्द्र लाल सरकार (1833-1904), एक दूरदर्शी व्यक्ति था और उसने 1876 में संघ की स्थापना की। यह संघ एक प्रकार से पहला संस्थान था जो भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान करने के लिए स्थापित किया गया था।


महेन्द्र लाल सरकार

महेन्द्र लाल सरकार ने 1863 में MD  डिग्री प्राप्त की और उसे 1870 में कलकत्ता विश्वविद्यालय का फ़ैलो और 1887 में कलकत्ता का शैरिफ़ नियुक्त किया गया। वह 1887 से 1893 तक बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसल का सदस्य भी रहा। और कलकत्ता की बहुत सी विद्या-सोसाइटियों से सम्बद्ध था। महेन्द्र लाल पक्का देशभक्त था और उसकी दिलचस्पी चिकित्सा शास्त्र के आगे भी थी। एक स्वप्नद्रष्टा होने के कारण उसने कल्पना की थी कि देश को पेश आ रही बहुत सी समस्याएं आधुनिक विज्ञान के अनुप्रयोग से ही हल की जा सकती हैं। महेन्द्र लाल ने यह जानकर बड़ी दूरदर्शिता दिखाई थी कि केवल शिक्षा पाठ्यक्रम में आंरभ करने की प्रक्रिया से विज्ञान देश में गहरी जड़े नहीं जमा पायेगा। अपने स्वप्नों को साकार करने के लिए महेन्द्र लाल ने संघ की स्थापना की। महेन्द्र लाल ने संघ का उद्देश्य ऐसे बताया : “इस संघ का उद्देश्य भारत के निवासियों को इस योग्य बनाना है कि विज्ञान का उसकी सब शाखाओं में संवर्धन कर सकें ताकि मूल अनुसंधान द्वारा और (और यह इसके बाद जरूर होगा) जीवन की कला और सुविधाओं के लिए इसके विभिन्न अनुप्रयोगों की दृष्टि से प्रगति की जा सके”। आरंभ में संघ का मुख्य कार्यकलाप प्रसिद्ध विद्वानों और वैज्ञानिकों के द्वारा लोकप्रिय विज्ञान लैक्चरों का आयोजन करना था। संघ ने 1891 में एक प्रयोगशाला विजीआनाग्राम द्वारा दिए उदार दान से बनाई थी। तथापि, महेन्द्र लाल के जीवनकाल में कोई भी संघ के तत्वाधान में अनुसंधान करने के लिए आगे न आया। अपनी मृत्यु से चन्द सप्ताह पहले महेन्द्र लाल ने अपनी इच्छा इन शब्दों में व्यक्त की थी : “नौजावन आदमी आगे आये और मेरे इस स्थान में कदन रखे और इसे एक बड़ा संस्थान बना दे”। इस प्रकार अमृतलाल सरकार ने रमण को देखा तो शायद उसने सोचा कि वह (रमण) शायद उसके पिता के स्वप्न को पूरा करेगा। और जैसा कि हम आज जानते हैं रमण ने वास्तव में महेन्द्रलाल सरकार के स्वप्न को पूरा किया।

यह एक आसान काम नहीं था। 1917 तक रमण अपने फाल्तू समय में संघ में अनुसंधान कार्य करता रहा। अनुसंधान कार्य फाल्तू समय में अत्यन्त सीमित सुविधाओं के साथ किया जा रहा था, तब भी रमण अग्रणी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं जैसे नेचर, दि फ़िलासोफ़िकल मैग्ज़ीन और फ़िज़िक्स रिव्यू में अपने अनुसंधान निष्कर्ष प्रकाशित कर सका। इस अवधि के दौरान उसने 30 मूल अनुसंधान शोध-पत्र प्रकाशित किए। इस अवधि में की गई उसकी रिसर्च मुख्यतः कम्पनों और प्रकाशकीय के क्षेत्रों पर संकेन्द्रित रही। उसने बहुत से वाद्य-यन्त्रों जैसे एकतारा, वायलन, तम्बूरा, वीना, मृदंगाम, तबला आदि का अध्ययन किया। वायलन पर अपन् विस्तृत अध्ययनों पर उसने एक प्रबन्ध प्रकाशित किया। प्रबन्ध का शीषर्क था ‘वायलन-परिवार के वाद्य-यन्त्रों के कम्पनों के यांत्रिक सिद्धांत, परिणामों के प्रयोगात्मक सत्यापन के साथ-भाग-1’। इस अवधि के दौरान आशु बाबू ही जिसने कभी विश्वविद्यालय की दहलीज़ पर कदम नहीं रखा था, उसका एकमात्र सहयोगी था। इससे रमण द्वारा प्रकाशित बहुत से शोध-पत्रों में संयुक्त-लेखक बनने से आशु बाबू को नहीं रोका गया। रॉयल सोसाइटी लंडन के कार्य-विवरणों में प्रकाशित एक शोध-पत्र का तो आशु बाबू एकमात्र लेखक था। 1919 में रमण ने रिर्सच विद्यार्थीयों को पहली बार लिया।


अमृतलाल सरकार

आशुतोष डे

संघ में रमण के कार्य में एक अवरोध उत्पन्न हुआ। उसे रंगून (1909) और नागपुर (1910) में स्थानान्तरित कर दिया गया। तथापि रमण का रिर्सच कार्य पूरी तरह रुका न था। दोनो ही स्थानों पर उसने अपने घर को प्रयोगशाला में बदल दिया और अपना काम जारी रखा। वह 1919 में कलकत्ता वापस आ गया। 1917 में आशुतोष मुखर्जी (1864-1924) ने रमण को नए स्थापित साईंस कालेज में प्रोफ़ेसर बनने के लिए आमंत्रित किया। मुखर्जी बीस वर्षों तक कलकत्ता हाईकोर्ट का जज रहा और वह अपने समय का महान् शिक्षा शास्त्री और विधिवेत्ता था। कलकत्ता विश्वविद्यालय का उपकुलपति नियुक्त होने पर उसने विज्ञान के विभिन्न विषयों के लिए न केवल ए पोस्ट-ग्रेजुएट विभाग आरंभ किया बल्कि धर्मदाय प्रोफेसरशिप सृजित करने के लिए उसने लोगों को प्रेरित भी किया। रमण वित्त विभाग में जो वेतन प्राप्त कर रहा था, प्रोफ़ेसर का वेतन उससे आधा था। तथापि एक वित्त आधिकारी के रूप में रमण बहुत सफल था। वास्तव में वित्त विभाग उसे छोड़ने के लिए अनिच्छुक था। अतः वाइसराय परिषद् के सदस्य (वित्त) ने लिखा : “हम ने पाया है कि वेंकटारमण वित्त विभाग के लिए बहुत उपयोगी है और वास्तव में हमारे सर्वोत्तम आदमियों में से वह एक है।” फिर भी, रमण ने यह प्रास्तव खुशी से स्वीकार कर लिया और जुलाई 1917 में पालित प्रोफ़ेसर के रूप में उसने कलकत्ता विश्वविद्यालय में पदभार संभाला। विज्ञान के प्रति रमण के सम्पूर्ण समर्पण से आशुतोष मुखर्जी बहुत प्रभावित हुआ जोकि उसकी इस टिप्पणी से स्पष्ट है : “सर तारकनाथ पालित द्वारा सृजित भौतिकी की पीठ के लिए मि. चन्द्रशेखर वेंकटारमण की सेवाएं प्राप्त करने में हम सोभाग्यशाली है जिसने अपने आप को उत्कृष्ट बनाया है और भौतिकी-विज्ञान के क्षेत्र में अपने शानदार अनुसंधान के लिए उसने यूरोपीय प्रसिद्धि प्राप्त की है और उसने यह काम अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में किया है जबकि उसकी अत्यावश्यक सरकारी कर्तव्यों के कारण उसका ध्यान बटता था। मैं यह सोच कर प्रसन्न हूँ कि उसके बहुत से अमूल्य अनुसंधान विज्ञान के संवर्धन के लिए भारतीय संघ के प्रयोगशाला में किए गए है जिसकी स्थापना हमारे सुप्रसिद्ध साथी डॉ. महेन्द्रलाल सरकार ने की थी जिसने इस देश में विज्ञान की उन्नति और संवर्धन के लिए संस्थान को अपना जीवन समर्पित कर दिया था। मैं अपने कर्तव्य में विफल रहूँगा यदि मि. रमण के आत्म बलिदान की भावना और उसके हौसले के लिए उसकी उचित प्रशंसा को व्यक्त करने के लिए अपने आपको रोक रखूँ। रमण ने एक लाभप्रद और उज्जवल भविष्य वाली सरकारी नियुक्ति को विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसरी के साथ बदलने का निर्णय लिया है जो, मुझे खेद है, पर्याप्त वेतन भी प्रस्तुत नहीं करती। इस एक उदाहरण से मुझे इस आशा को बनाए रखने का हौसला मिला है कि ज्ञान के मंदिर में, जिसका हम निर्माण करना चाहते हैं, सच्चाई के अन्वेषकों की कोई कमी नहीं होगी”।


आशुतोष मुखर्जी

रमण की नियुक्ति से पहले आशुतोष मुखर्जी को धर्मादाय की व्यवस्था को बदलना पड़ क्योंकि पालित पीठ के लिए नियुक्ति के लिए एक अपेक्षा यह थी कि उम्मीदवार विदेश में प्रशिक्षण-प्राप्त होना चाहिए। लेकिन “प्रशिक्षित” होने के लिए रमण ने विदेश में जाने से इन्कार कर दिया। पालित प्रोफ़ेसर के रूप में रमण की नियुक्ति की शर्तों में पढ़ाने की जिम्मेदारियां शामिल नहीं थी। उसकी ड्यीटियां भी :

  • अपने विषय के मूल अनुसंधान में अपने आपको लगाना ताकि ज्ञान की सीमाओं का विस्तार किया जाए।
  • विद्यार्थीयों को अनुसंधान की प्रेरणा और मार्गदर्शन देना।
  • कालेज ऑफ साईंस में प्रयोगशाला का पर्यवेक्षण करना।
यद्यपि वह शिक्षण उत्तरदायित्व से मुक्त था लेकिन रमण एक जन्मजात अध्यापक था, इसलिए क्लास-रूम से परे न रह सका MSC पढ़ाने में उसने प्रमुख भाग लिया। यहां हम उसके एक विद्यार्थी एल.ए. रामदास को उद्धृत करते है : “प्रो. रमण ने वर्ष 1920-21 में विस्तृत और चुम्बकत्व और 1921-22 में भौतिक-प्रकाशकीय लिया। दोनों विषयों के MSC विद्यार्थीयों ने महसूस किया कि वे वास्तव में एक प्रकार के प्रेरित शिक्षण को सुन रहे हैं जिसके लिए प्राचीन काल की वास्तविक महक और जोश लाया गया था। हमने उसके बहुत सी उत्तेजना और शानदार रोमांच की सहभागिता की, जो बेंजेमिन फ्रेंकलिन, ओयर्सटेड, अरागो, गाउस, फ़ेराडे, मैक्सवेल, हर्टज़, लार्ड केलवीन और बहुत अन्य विज्ञानियों ने अपने वास्तविक खोजें करते हुए महसूस किया होगा। उसे पढ़ाने की बहुत लग्न थी और कई बार तो वह पूरा पूर्वाह्न 2 घंटों और कई बार 3 घंटों के लिए भी ले लेता था और प्रत्येक लैक्चर के बाद हम मूल शोध-पत्रों और शोध-प्रबन्धों जैसे मैक्सवेल का विद्युत और चुंबकत्व, जे.जे. थामसन का विद्युत चालन, फ़ेराडे का प्रयोगात्मक अनुसंखधान, लार्ड रेलेह और केलवीन के एकत्रित शोध-पत्र आदि अपने आप ही देखने लग जाते थे”।
कलकत्ता विश्वविद्यालय में पदभार संभालने के बाद भी रमण को संघ की प्रयोगशाला में अपना कार्य जारी रखने की अनुमति थी। वास्तव में संघ, विश्वविद्यालय की अनुसंधान भुजा बन गया। 1919 में अमृतलाल सरकार की मृत्यु के बाद रमण को संघ का अवैतनिक सचिव चुना गया और कलकत्ता छोड़ने तक 1933 तक वह इस पद पर बना रहा। ऐसी बात नहीं थी कि रमण कलकत्ता छोड़ने के लिए राज़ी था लेकिन भारतीय विज्ञान की एक अन्य प्रतिष्ठित हस्ती मेघानन्द साहा और उसके बीच उठे विवाद के कारण उसे जाना पड़ा। रमण को संघ के अवैतनिक सचिव पद से वोट डाल कर बाहर किया गया। रमण के लिए अनादर का यह तलख़ पल था और ऐसा इसलिए भी क्योंकि उसका अपना अंह हिमालय से भी ऊंचा था। और इस प्रकार उसने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC) बेंग्लोर के लंबित निमन्त्रण को स्वीकार किया और उसका निदेशक बनने का फ़ैसला किया। वह पहला भारतीय था जो इसका निदेशक बना। रमण ने सर मार्टिन फोस्टर FRS का स्थान लिया। उसने निदेशक (1933-37) और भौतिकी विभाग प्रधान (1933-48) दोनों स्थितियों में भारतीय विज्ञान संस्थान में काम किया।

साईंस कालेज, कलकत्ता

जब रमण ने भारतीय विज्ञान संस्थान में कार्यभार संभाला तो इसकी शैक्षणिक उपलब्धियां ज्यादा उच्च नहीं थी। इसकी निधियन स्थित कलकत्ता विश्वविद्यालय से बहुत बेहतर थी जहां रमण ने कार्य किया था। रमण ने निम्नलिखित परिवर्तन किए :

  • एक नया भौतिक विभाग अस्तित्व मे लाया गया।
  • कुछ पहले से विद्यमान विभागों का पुनर्गठन किया गया।
  • सूक्ष्मता यंत्रों के निर्माण के लिए एक केन्द्रीय वर्कशाप स्थापित करने के उपाय किए गए।
  • सुन्दर फूलों के उद्यान लगा कर इर्द गिर्द पर्यावरण को सुधारा गया।

शैक्षिणक निपुणता प्राप्त करने के लिए उसने स्वयं योग्य विद्यार्थीयों की एक टीम गठित की और भौतिकी के कई क्षेत्रों में उच्च कोटि के अनुसंधान करने आरंभ किए। उत्कृष्ट अध्यापक-वर्ग की भरती करके, रमण काण्टम मकेनिक्स, क्रिस्टल कैमिस्टरी, विटामिन और इन्ज़ाइम कैमिस्टरी जैसे क्षेत्रों में मूल अनुसंधान आरंभ करना चाहता था। उस निश्चित समय पर बहुत से प्रसिद्ध वैज्ञानिकों को हिटलर की जाति नीति के कारण जर्मनी छोड़नी पड़ी। रमण इन में से कुछ विज्ञानिकों को IISC में लाना चाहते थे। रमण की सूची मे विदेशी और भारतीय बहुत से नाम थे। तथापि वह केवल मैक्स बार्न को ही ला पाने में सफल हो सका और वह भी अल्पावधि के लिए।


नील बोहर और रमण

भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंग्लौर

रमण के कुछ प्रस्तावों का वर्तमान स्टाफ़ द्वारा विरोध किया गया। वास्तव में वर्तमान विभागों के पुनर्गठन और इंस्टीच्यूट वर्कशाप के रमण के सुझाव के कारण दो प्रोफ़ेसरों –कैमिस्टरी प्रोफ़ेसर (प्रो. वाटसन) और विद्युत इंजीनियरी प्रोफ़ेसर (प्रो. मोडावाला) को त्यागपत्र देना पड़ा। नव स्थापित भौतिकी विभाग की सहायता के लिए इंस्टीच्यूट के बजट के पुनः आबेटन के रमण के कृत्य के कारण गबन का चार्ज लगा। उस पर आरोप लगा कि अन्य विभागों की कीमत पर वह भौतिक विभाग को संरक्षण दे रहा है। मैक्स बार्न को इंस्टीच्यूट में रखने के उसके प्रयास को भी कई लोगों ने पासन्द न किया। समय बीतने पर रमण ने पाया कि वह अलग-थलग होता जा रहा है। कैम्पस में बढ़ती हलचल को देखते हुए परिषद्, इंस्टीच्यूट के प्रबन्धन को देखने वाले निकाय, ने विज़िटर (तब ब्रिटिश भारत का वाइसराय) को जुलाई 1935 में एक पुनरीक्षा समिति नियुक्त करने की सिफ़ारिश की ताकि इंस्टीच्यूट के मामलों की समीक्षा की जाए। समिति की 19 जनवरी,1936 की औपचारिक रूप से घोषणा की गई और इसमें सर जेम्स इरविन, प्रिंसिपल और वाइस चांसलर सेंट एन्डरियूस यूनिवर्सिटी, डॉ. ए.एच. मेकेन्जी प्रो. वाइस चांसलर, ओसमानिया यूनिवर्सिटी, और डॉ. एस.एस. भटनागर तत्कालीन भौतिकी प्रोफ़ेसर, पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर। इरविन समिति का अध्यक्ष था। समिति ने वाइसराय को अपनी रिर्पोट मई 1936 में प्रस्तुत की जिस में कुल मिला कर रमण के विरुद्ध लगाये आरोपों की पुष्टि यह कहते हुए की रिर्पोट में बताया गया : “संभावित अत्युक्ति की पूरी गुंजाइश रखते हुए, हमें खेद है कि इन आरोपों में बहुत सच्चाई है। प्रो. वाटसन और प्रो. मोडावाला के त्याग-पत्रों की बात अब आसानी से समझी जा सकती है”। इरविन समिति रिर्पोट के अनुसार, रमण न केवल प्रशासनिक अनियमिताओं का दोषी था बल्कि वित्तीय त्रुटियों का भी। समिति ने रमण को प्रायोगिक विज्ञान का विरोधी होने का भी दोष लगाया। रमण को फटकारने के अलावा समिति ने निदेशक की शक्तियों को घटाने के उपायों का भी सुझाव दिया। उदाहरणार्थ समिति ने सुझाव दिया कि “बजट को” स्वीकृत करने से पहले इसे कम से कम बारी बारी चार निकायों के माध्यम से तैयार किया जाए। “एक वैज्ञानिक संस्थान की सफलता के लिए ज़रूरी प्रगामी प्रशासन के मार्ग में इससे अलंघ्य अवरोध पैदा हो जाएंगे”। परिषद् ने इरविन समिति की रिर्पोट का समर्थन किया और संस्थान के प्रबंधन और रमण के बीच संघर्ष बढ़ता चला गया। अन्ततः स्थिति ऐसी हो गई कि संस्थान के निदेशक पद से त्यागपत्र देने के अलावा रमण के पास कोई विकल्प न बचा। वास्तव में उसे कहा गया कि त्यागपत्र दे अन्यथा उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी। तथापि वह संस्थान में भौतिक प्रोफ़ेसर के रूप में बना रहा और 1948 में प्रोफ़ेसर के रूप में संस्थान से सेवानिवृत्त हुआ।


रमण और राजेन्द्र प्रसाद

संस्थान से सेवानिवृत्ति के बाद उसने अपना संस्थान – रमण अनुसंधान संस्थान (RRI) बनाने की ओर ध्यान संकेन्द्रित किया। सेवानिवृत्ति के पहले ही रमण ने एक संस्थान बनाना आरंभ कर दिया था जहां वह सेवानिवृत्ति के बाद जाएगा और विज्ञान का आनन्द लेगा। रमण को उद्धृत करते है : “आप जानते है कि 60 वर्ष की आयु पर मुझे सेवानिवृत्त होना था। इसलिए सेवानिवृत्ति के दो वर्ष पहले मैंने इस संस्थान को बनाने का काम आरंभ कर दिया ताकि सेवानिवृति के दिन मै अपना बैग उठाऊंगा और सीधे इस संस्थान मे चला जाऊंगा। मैं एक दिन के लिए भी बेकार नहीं रहना चाहता”। इस संस्थान के निर्माण के लिए रमण को धन जुटाना पड़ा। रमण ने एक पूंजी-निवेश में नोबेल पुरस्कार से प्राप्त धन सहित अपने जीवन भर की कमाई खो दी थी। महाराजा मैसूर द्वारा उपहार स्वरूप दी गई भूमि के एक दस एकड़ प्लाट पर संस्थान का निर्माण किया गया। वर्ष 1934 में यह भूमि भारतीय विज्ञान अकादमी को संबंधित कार्यकलापों के लिए दिया गई थी। संस्थान के लिए भवन निर्माण के लिए दान प्राप्त करने के लिए रमण ने बहुत यात्राएं की। रमण जब संस्थान में गया तो सुविधाएं बिल्कुल अपूर्ण थी। संस्थान चलाने के लिए सरकारी अनुदान प्राप्त करने के विचार के वह खिलाफ़ था। संस्थान के लिए धन कमाने के लिए उसने (अपने पूर्व विद्यार्थीयों के साथ मिलकर) चन्द रसायन उद्योग शुरू किए। इन उद्योगो से पर्याप्त लाभांश प्राप्त हो रहा था जिस से आरंभ में संस्थान चलाया जा सके। उसने लेकिन शांति पुरस्कार और अपनी व्यक्तिगत सम्पत्तियों को संस्थान के लाभ के लिए अकादमी को उपहार-स्वरूप दे दिया। रमण के संग्रह – क्रिस्टलों, हीरों, खनिजों, चट्टानों के नमूनों, सीपी, मरे हुए पक्षी, तितलियां आदि रखने के लिए एक म्यूज़ियम बनाया गया। रमण को रंग बहुत अच्छे लगते थे और इस प्रकार उसने प्रत्येक ऐसी वस्तु एकत्र की जिसमें रंग थे।


रमण जवाहर लाल नेहरू के साथ

भारतीय विज्ञान अकादमी बैंग्लोर को रमण द्वारा स्थापित किया गया या और अब देश में यहां से सर्वोत्तम विज्ञान पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। यह अकादमी 27 अप्रैल, 1934 को बनाई गई और इसे सोइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट के अन्तर्गत बैंग्लोर में पंजीकृत किया गया। रमण के अलावा 160 फ़ाउंडेशन फ़ैलो थे। अकादमी की उद्धाटन बैठक भारतीय विज्ञान संस्थान के कैमेपस में अगस्त, 1943 को हुई। सारे भारत से सवोत्कृत विज्ञानियों को रमण अकादमी के लिए चुना गया। अकादमी के गठन के बारे में टिप्पणी करते हुए रमण ने पहली वार्षिक बैठक में अपने भाषण में कहा, “फैलोज़ की हमारी सूची भारत के सब भागों का प्रतिनिधित्व करती है। 38 फैलोज़ के साथ बम्बई सूची में सबसे ऊपर है जिसके बाद मद्रास प्रेसिडेंसी से 35 और मैसूर राज्य से 33 फैलो हैं। अन्य प्रदाशों को भी पूरा प्रतिनिधित्व दिया गया है। सूबजात मुतहिदा से 21, पंजाब से 13, बंगाल से 11, मध्य सूबजात से 8 फ़ैलों और बिहार, उड़ीसा, हैदराबाद, ट्रावन्कोर और बर्मा से प्रतिनिधि हमारी सूची में शामिल हैं।”
अकादमी के लक्ष्य थे:

I) अनुसंधान के परिणामों पर चर्चा के लिए बैठके आयोजित करना
II) विशेष विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन करना
III) कार्य-विवरणों को प्रकाशित करना।

अन्य देशों से भिन्न, भारत में तीन विज्ञान अकादमियां हैं। रमण ने अकादमी का निर्माण अपने बलबूते पर किया। मई 1933 में प्रकाशित करेन्ट साईंस में अपने सम्पादकीय में रमण ने अकदमी की ज़रूरत पर पहले पहले बल दिया। रमण ने लिखा : “अनुसंधान संस्कृति है और एक राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास को निर्धारित करता है – इस दृढ़ धारणा को भारत में प्रशासनिक नीति के भाग के रूप में पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया गया और इस मूलभूत तथ्य की धीमी और शायद अनिच्छुक मान्यता के लिए एक अखिल भारतीय वैज्ञानिक संगठन के अभाव को हम दोष देने के लिए विवश हैं, जिसका कार्य होगा कि विज्ञान भौतिक और आध्यत्मिक धन है – इस सिद्धांत पर जागरूक जनता की राय को संकेन्द्रित करना ............. हमे ऐसा लगता है कि एक राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की शीघ्र स्थापना से भारत में सब अनुसंधान संस्थानों के बीच कार्यकलापों का निकट और बेहतर संगठित सहयोग प्राप्त किया जा सकेगा और यह अपनी आधिकारिक पत्रिका के माध्यम से विज्ञान के सर्वोत्तम हितों के समेकन और प्रोत्साहन के लिए ज्यादा व्यापक प्रभाव उत्पन्न होगा। ” रमण ने आगे लिखा : “यद्यपि किसी देश की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा, इसके संस्थानों में उत्पादित कार्य की गुणवत्ता द्वारा स्थापित होती है लेकिन अधिरचना को राष्ट्रीय पत्रिकाओं द्वारा ऊँचा उठाया जाता है जो उनकी सर्वोत्तम उपलब्धियों को शेष संसार के सामने प्रस्तुत करती हैं”। इस सम्पादकीय को लिखने के बाद रमण ने एक प्रश्नावली भारतीय वैज्ञानिकों के बीच परिपत्रित की ताकि उनके विचार जाने जा सके। एम.एन. साहा की अध्यक्षता में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 1934 सत्र में रमण द्वारा प्रस्तावित अकादमी के विचार पर चर्चा की गई। साहा ने इस विचार का समर्थन किया और एक मॉडल के रूप में रॉयल सोसाइटी ऑफ लंडन का प्रस्ताव दिया। आम सभा में इस विषय पर विचार करने के बाद इसे 25 सदस्यी अकादमिक कमेटी, जिनमें रमण भी शामिल था, को निर्देशित किया गया। तथापि जब अकादमिक समिति कोई शीध्र निर्णय न ले सकी तो रमण ने समिति से इस्तीफ़ा दे दिया और अपनी अकादमी बना ली।


कृष्ण राजा – मैसूर का महाराजा

राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान 3 जनवरी, 1935 को अस्तित्व में आया। इस की उद्धाटन बैठक 7 जनवरी, 1935 को कलकत्ता में हुई। 1946 तक इसने कलकत्ता मे काम किया और उसके बाद इसे दिल्ली लाया गया। 1970 मे इसका नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी रखा गया। राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान स्थापित करने के पिछे केवल और अकादमी बनाने का विचार नहीं था बल्कि एक समन्वय निकाय बनाना था। अतः इसकी आरंभिक बैठक में ल्यूस एल फर्मर, राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान के प्रथम अध्यक्ष ने कहा : “गत वर्ष के दौरान अकादमी शब्द हमारे सामने बहुत बार आया है अतः यह वांछित है कि हम पहले इस बात का पता लगाएं कि अकादमी शब्द का क्या अर्थ है। आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि पहली अकादमी, एथिन्स में एक मनोरंजन उद्यान था जिसके बारे में माना जाता है कि वह एक प्राचीन एटिक नायक अकाडीमस का था...... इस उद्यान में यूनानी दार्शनिक प्लाटो 50 वर्षों तक पढ़ाते रहे; और इस प्रकार आरंभ की गई अकादमी प्लाटो के समय से लेकर सिसरो के समय तक 300 वर्षों से अधिक समय तक रही...... जब कि अकादमियां, यदि उसके मूल अर्थ तक जायें तो, अपने कार्यकलापों के अति महत्वपूर्ण मागों में स्थानीय या क्षेत्रीय तौर पर उन्हें काम करनी चाहिए, लेकिन वे उचित रूप से अपने क्षेत्र को व्यापक भी कर सकती है....... जब 1933 में, जब एक भारतीय विज्ञान अकादमी स्थापित करने के लिए प्रास्तव दिया गया तो हमने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि ऐसी दो अकादमियां पहले से ही विद्यमान थीं......एक का नाम एशियाटिक सोसाइटी, बंगाल और दूसरी विज्ञान अकादमी। इस प्रकार एक तीसरी भारतीय अकादमी बनाने का तार्किक रूप से अर्थ यह था कि भारत के एक अन्य भाग में एक नए उद्यान का सृजन किया जाये या एक निकाय का सृजन किया जाए जो पहले उपलब्ध उद्यानों का समन्वय करे। बैंग्लोर में हमारे मित्र सब समय जानते हैं कि उन्हें अकादमी स्टेटस की एक सोसाइटी की ज़रूरत है जिसका मुख्याल बैंग्लोर में हो। यदि आरंभ में उन्होंने ऐसा दृढ़तापूर्वक कहा होता तो गत वर्ष के दौरान वैज्ञानिक क्षेत्रों में जो उलझन पैदा हुई उससे बचा जा सकता था, क्योंकि यह स्पष्टतः सही है कि दक्षिण भारत का अपना दार्शनिक उद्यान होना चाहिए। तथापि, बैंग्लोर ने ऐसा नहीं किया.......हमारे बैंग्लौर के मित्रों के इधर उधर जाने के तरीके को प्रति तटस्थ रहते हुए हम बैंग्लौर में स्थापित भारतीय विज्ञान अकादमी का स्वागत करते हैं.......लेकिन अभी भी हमें एक समन्वयन निकाय की ज़रूरत है और इस कारण यह ज़रूरी है कि राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किया जाए।”
राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान के, रमण सहित, 125 फाउंडेशन फ़ैलो हैं


रमण अपने कुछ सहभोगियों के साथ
बैठे हुए (बायें से दायें) वी एस तम्मा, एस के बेर्नजी, सी.वी.रमण, एन.के.सूर और एन के सेठी खड़े (बायें से दायें) : के. सेशागिरि राव बिद्युतभूषणराय, लाल दत्ता दर्गादास बेनर्जी, वाई. वेन्केटरामेय्या, पंचानन दास और आशुतोष डे। नीचे बैठे (बायें और दायें) एल ए रामदास, सुन्दारमण

रमण अपने कुछ सहयोगियों के साथ
बैठे हुए (बायें और दायें) : ए.एस गनेशन, एल ए रामदास के एस कृष्णन, सी.वी. रमण, के.आर. रामानाथन एस वेंकेटस्वरण, एस.एस मूर्तिराव, खड़े (बायें से दायें) रामास्वामी, एस. भगवानतम एस परमासिवन, श्रीनिवास राव, एन. एस नगेन्द्रनाथ, आर अनन्तकृष्णन और सी.एस वेंकेटस्वरण

सूबजात मुतहिदा विज्ञान अकादमी की स्थापना इलाहाबाद में 1930 को हुई। इसे अब राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, इलाहाबाद का नया नाम दिया गया है।
करेनट साईंस पत्रिका राष्ट्रीय विज्ञान की अकादमी बैंग्लोर का बहुत प्रसिद्ध जर्नल है और अकादमी के निर्माण से पहले ही इसे आरंभ कर दिया गया था। 1931 में, बैग्लोर में, भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सत्र के दौरान एक विशेष बैठक में पारित संकल्प के फलस्वरूप इसे स्थापित किया गया था। भारतीय विज्ञान अकादमी की प्रोसीडिंग्स भी 1934 में शुरू की गई। इस का उद्देश्य था कि सब वैज्ञानिक व्यक्तियों को कम से कम एक सामान्य बोध प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना कि भारत में, उनकी अपनी विशिष्टता के अलावा, ज्ञान के क्षेत्र मे क्या हो रहा है। तथापि, जैसे जैसे प्रकाशित सामग्री की मात्रा तेज़ी से बढ़ती गई, प्रोसीडिंग्स को कई विषय जर्नलों-यानी प्रोसीडिंग्स, कैमिकल साईंस और इंजीनियरिंग साईंसस (बाद मे उसका नाम साधना रखा गया) में विभाजित कर दिया गया। अकादमी द्वारा प्रकाशित अन्य जर्नल है : प्रमाणन – भौतिकी की पत्रिका, मैटिरियल साईंस का बुलेटिन, बायोसाईंसिस का बुलेटिन, खगोल-विज्ञान और खगोल-भौतिकी का बुलेटिन, आनुवंशिकी और प्रतिध्वनि का जर्नल : विज्ञान शिक्षा की पत्रिका। यह बात ध्यान देने योग्य है कि आनुवंशिकी जर्नल की स्थापना विलियम बेटीसन ने 1910 में इंग्लैंड में की थी। बाद में ज.बी.एस. हाल्डेन इस जर्नल को भारत में लाया। तथापि 1977 से जर्नल का प्रकाशन बन्द हो गया और बाद में अकादमी ने इसे पुनः चालू किया।


वुल्फ़गैंग पाली के साथ रमण

वर्नर हीसनबर्ग (दायें) के साथ रमण

अकादमी ने एक प्रतिष्ठित रमण प्रोफ़ेसरशीप स्थापित की। इसने युवक सहचारिता की एक योजना आरंभ की है ताकि उत्कृष्ट युवा विज्ञानिकों को अकादमी के फ़ैलोज के साथ सहचर्य का अवसर प्रदान किया जाए। रमण के समय से, अकादमी विचार-गोष्ठियों और वार्तालापों को प्रायोजित करती आई है। रमण का विचार था कि भारत की समस्याओं का समाधान केवल विज्ञान ही कर सकता है। उसने कहा : “भारत की आर्थिक समस्याओं का केवल एक ही हल है और वह है विज्ञान और ज्यादा विज्ञान”। लेकिन तब रमण ने इस बात पर बल दिया कि भारत को विचारों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। भारत अपनी समस्याओं को हल करने के लिए स्वयं समर्थ है। उसने कहा : “विगत काल में भारत ने छात्रवृत्ति, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्रों में अपनी महानता प्रदर्शित की है लेकिन आज हम असहाय होकर विज्ञान के ज्ञान के लिए पश्चिमी देशों पर आश्रित हैं। भारत को विज्ञान में नेता बनना चाहिए, अनुयायी नहीं। पश्चिम से विचार प्राप्त करने का कोई लाभ नहीं है। हमें अपनी समस्याओं पर स्वयं विचार करना है और उनका हल ढूंढना है।”


ज़ाकिर हुसैन के साथ रमण

तथापि, यह ज़रूरी है कि भारतीयों को उनकी शक्ति के बारे में क़ायल किया जाए। रमण ने एक बार युवकों को सम्बोधित करते हुए कहा : “मेरे सामने जो जवान आदमी और स्त्रियां हैं मैं उन्हें कहना चाहूँगा कि वे आशा और हौसला का दामन न छोड़ें। आपके सामने जो कार्य पड़ा है उसमें उत्साहपूर्ण समर्पण से ही आपको सफलता मिलेगी और इस विश्व में प्राप्त की गई कोई भी चीज़ व्यर्थ है जो परेशानी पर पसीने के बिना आपके पास आती है। मैं किसी खण्डन के भय के बिना इस बात पर बल देता हूँ कि भारतीय मस्तिष्क की गुणता किसी भी ट्यूटानिक, नोरडिक या ऐंग्लो-सेक्सन मस्तिष्क की श्रेष्ठता के बराबर है। शायद हमारे अन्दर हौसले की कमी है, शायद हमारे अन्दर चालन शक्ति की कमी है जै हमें कहीं भी ले जा सकती है। मेरा विचार है कि हम हीन भावना से पीड़ित हैं। मेरे विचार से आज भारत के लिए जिस बात की ज़रूरत है वह है पराजय मनोवृत्ति का नाश करना। हमें विजय की मनोवृत्ति की ज़रूरत है, एक मनोवृत्ति जो हमें सूर्य के नीचे हमारे अधिकार पूर्ण स्थान तक ले जाएगी, एक मनोवृत्ति जो स्वीकार करेगी कि हम गौरवपूर्ण सभ्यता के उत्तराधिकारी होते हुए, इस उपग्रह पर अपने अधिकारपूर्ण स्थान के हक़दार हैं। यदि हमारे अन्दर ऐसे अदम्य मनोभाव पैदा हो जाएं तो अपनी न्यायोचित तक़दीर को प्राप्त करने से हमें कोई नहीं रोक सकता”।

उसका विचार था कि किसी भी देश का भविष्य उस के संचित ज्ञान और नौजवान पीढ़ी पर निर्भर होता है। उसने कहा : “यदि आप मुझे पूछें कि एक राष्ट्र का सब से महान् उद्योग – मुख्य उद्योग – क्या है तो मुझे यह कहने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं होगी कि यह ज्ञान का उत्पादन और फैलाव है......एक आदमी या संस्थान के लिए इस से ज्यादा महान् बात नहीं है कि एक युवा पीढ़ी स्वास्थ्य और शक्ति और बौद्धिक जोश और शारिरिक चुस्ती के साथ विकास करे।”


महात्मा गांधी और महादेव देसाई के साथ रमण

कस्तूरबा गांधी के साथ लोक सुन्दरी

रमण का विज्ञान के बारे में विचार धार्मिक था। वह सोचता था कि प्रकृति सर्वोत्तम शिक्षक है। उसने कहा, “अंतिम विश्लेषण में विज्ञान, प्रकृति के अध्ययन और प्रेम के सिवाय ओर क्या है जिसे अमूर्त पूर्जा के रूप में प्रदर्शित नहीं किया जाता बल्कि व्यावहारिक रूप में तलाश किया जाता है कि प्रकृति को समझा जाए ?” उसने कहा : “भारतीय दर्शन का अधिकांश भाग प्रकृति की गूढ़ समझदारी है। भारतीय दर्शन का अधिकांश भाग प्रकृति के तथ्य के तर्काधार और अर्थ को ही समझने से संबंधित है।” महात्मा गांधी के विचारों में रमण का बहुत विश्वास था। उसने कहा : “प्रत्येक पाठ्य पुस्तक में गांधी जी का चित्र मुखचित्र के रूप में होना चाहिए और गांधी जा के साबरमती से बिरला हाउस तक दिए प्रवचन उनमें शामिल होने चाहिए। विश्व के महानतम व्यक्ति और राष्ट्रपिता की स्मृति में श्रद्धांजली का यह सर्वोत्तम और अत्यधिक प्रभावी तरीका है और स्मारक बनाने या मूर्तियां खड़ी करने से यह बेहतर होगा।” उसने आगे कहा : “उसकी (गांधी जी) की शिक्षाओं में मानव आत्मा जो अविनाशी और अविजय है के परम गुणों पर बल दिया गया है। यदि भारत मानव-आत्मा के मूल्य नहीं बनाए रखता तो उसे आकाश के नीचे स्थान पाने की कभी आशा नहीं करनी चाहिए।” गांधी जी के सम्मान में उसने रमण अनुसंधान संस्थान में गांधी स्मृति व्याख्यान आरंभ किए। रमण मृत्यु पर्यन्त कभी भी यह भाषण देने में कभी चूक नहीं की। रमण की पत्नी लोकसुन्दरी कस्तूरबा गांधी से अच्छी तरह परिचित थी।

रमण ने महिलाओं के पक्ष का दृढ़ता से समर्थन किया। उसने एक बार कहा : “मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि यदि भारत की स्त्रियां विज्ञान को अपनाएं और विज्ञान की प्रगति और उन्नति में भी रूचि लें तो वे सब कुछ प्राप्त कर सकेंगी जो पुरूष प्राप्त करने में विफल रहे हैं। स्त्रियों में एक गुण है – समर्पण का गुण। विज्ञान में सफलता का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पासर्पोट है। इसलिए यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि विज्ञान पर केवल पुरूषों का ही एकमात्र अधिकार है”।


रमण और ए एच काम्पटन (मध्य)

जहां रमण का दाह-संस्कार हुआ था, रमण अनुसंधान संस्थान के कैम्पस के उस स्थल पर वृक्षारोपण किया गया।

संस्थान के निर्माण और विद्यार्थियों के प्रशिक्षण में रमण ने महान् नेतृत्व का प्रदर्शन किया। रमण ने विज्ञान की प्रगति के लिए भारतीय संघ और कलकत्ता विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग दोनों को शिक्षण के प्राणवान और शानदार केन्द्र बना दिया। उसकी ख्याति के कारण देश के सब कोनों से विद्यार्थी आकृष्ट हुए। रमण भारतीय विज्ञान कांग्रेस के संस्थापकों में से एक था जिसे 1914 में स्थापित किया गया और कई वर्षों तक वह इसका सचिव रहा और इसका अध्यक्ष भी बन गया। उसने भौतिकी के भारतीय जर्नल की स्थापना की। भारतीय विज्ञान संस्थान बैंग्लोर में अपने 15 वर्षों से ज्यादा क